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हाँ मैने देखा है

  • Writer: HoodySoul
    HoodySoul
  • Jun 30, 2020
  • 2 min read
शहर में सुबह सुबह नींद खुलते ही, कुछ सपनो को टूटते देखा है। लोगों को उजाले की ओर भागते देखा है। देखा है मैंने बच्चों को बस्ते का बोझ उठाते, उन छोटी छोटी आँखों में सपनों की लड़ी लगाते। फिर कुछ ही दूरी पर, उन्हीं आँखों में बेबसी को भी देखा है, उन नन्हे-नन्हे हाथों से, सड़कों पे ज़िंदगी खरीदते देखा है। शहर के हर उस छोटी गली में, उनकी प्यारी मासूमियत का डेरा देखा है। कुछ मोतियों को उनकी आँखों से, फिसलते भी देखा है। हाँ मैने देखा है, रोज सुबह ख्वाबों को चूर होते देखा है।

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देखा है मैंने एक ओर कुछ लोगों को, जिनका न कोई ठिकाना होता है, चेहरे पर उनके बस बहाना होता है, और दंगे करके लोगों को डराना होता है। वहीं दूसरी ओर कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें भुखमरी से लड़ते देखा है, रोटी, कपड़ा और मकान के लिए मरते देखा है। और उन सबके बीच खुद को लाचार खड़े भी देखा है। हाँ देखा है मैंने, इन सब को देखा है, और, धर्म के नाम पे एकजुटता दिखाने को, धर्म के रखवालों को बढ़ते देखा है। और फिर उन्ही धर्म के रखवालों को, देश जलाते भी देखा है।

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हाँ देखा है मैंने, लोगों को पानी से पेट भरते, खुद से ही खुद को हारते। लोगों को लोगों से ही बचते देखा है, हौले हौले दरए देखा है। देखा है यह सोचते की कोई पूछ न ले, माँ को नई साड़ी दिलाई या नही, खुद के लिए कपड़े सिलाये या नही, त्योहार में बच्चों के लिए मिठाई मंगाई या नही, इन तानो से बचते बचते, खुद में टूटते देखा है। ऐसे ही कुछ लोगों का ख़्वाब दूसरों को लूटते देखा है। हाँ मैंने देखा है, आम आदमी को कुछ इस तरह हारते देखा है। उस ईश्वर से जरूरतों के लिए लड़ते देखा है, देखा है मैने उनकी सुबह को रात होते, और खुद में गुम होकर, हर दिन मौत की तलाश में भटकते। चेहरे पर सजाकर फ़िक्र की लाली, हाथों में लकीरें खाली, पर फिर भी उनको मुश्कुराते देखा है। रोज़ सुबह उठके फिर खाली आँखों से सोते देखा है, या यूँ कह लो कुछ लोगों को मुसीबतों के बवंडर से निकलते देखा है। हाँ कुछ इस तरह के लोगों को, मैन रोज़ जीते देखा है। मैन रोज़ जीते देखा है।।


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